मनजीत नेगी/IBEX NEWS, शिमला
कामरू मंदिर प्रांगण में बद्रीनाथ देवता जी की और से विदाई समारोह का आयोजन किया गया। छितकुल मतादेवी की आज वापसी है।
इस मौके पर उनके साथ आए लोगों देवलुओंं को विशेष फूल भेंट किए गए। स्थानीय लोगों ने सूखे मेवे की मालाओं से भी माता देवी के साथ आए लोगों का आभार जताया। ये जश्न यूं ही चलता रहे,गांव में खुशियां रहें और माता देवी से बिछुड़ने की धारणा पर लोग भावुक हो जाते है।
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आसपास के ऊंचे पहाड़ों से विशेष तौर पर देवता साहब के आदेशों से ये फूल विदाई पर लोगों को भेंट स्वरूप दिए जाते है और परंपरा के अनुसार टोपियों पर गांव की महिलाएं सजाती है।
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इसके साथ ही ब्यूलिंग धार्मिक उत्सव समाप्ति की और बढ़ता है।
हिमाचल प्रदेश के जिला किनौर की सांगला घाटी के टॉप पर स्तिथ कामरू मंदिर में ये उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। किन्नौर की सब देवी देवताओं में शक्तिशाली माने जाने वाली देवी छितकुल अपने पति बद्रीनाथ से मिलने कामरु मंदिर पहुंची है,ब्यूलिंग मिलन समारोह के नाम से आयोजित इस उत्सव में कामरू के लोग जश्न की भांति मनाते है।
बीते पांच दिनों से सदियों पुरानी इस परंपरा के अयोजन को लेकर खूब उत्साहित रहे है ।
हर घर में मातादेवी के साथ आए लोग खाना खाने पहुंचते है। लोगों की टोलियां बनाकर घरों के लिए चयनित होती है। फिर मेहमान नवाजी का दौर शुरू होता है।
इस धार्मिक उत्सव के दौरान सांगला के कामरू में बद्रीनाथ देवता जी की दावत के बाद देवालुओं और ग्रामीणों ने जम कर नृत्य किया।वाद्य यंत्रों की धुनों के साथ युगों से चले आ रहे परंपरागत लोक संगीत के साथ माहौल जीवंत हो उठा। बद्री नाथ जी,माता देवी जी,कलम सिंह जी और छत्र सिंह जी की अगुवाई में लोग खूब उत्साहित रहे। इस धार्मिक अनुष्ठान में सरोबार नजर आया। अति सुन्दर इस माहौल में सभी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लोग खंगालते भी दिखे की ये कितना पुराना इतिहास है। लोग हैरान थे कि बिना किसी लिखित प्रमाण के अभी तक भीi ये परंपरा कायम है। इसका श्रेय गांव के बुजुर्ग,कारदार,एवम देवी देवताओं के आदेश को ही दिया जाता है। इस धार्मिक उत्सव बहुत सारे नौजवान भी शामिल हुए। जिन्होंने सदियों पुरानी रिवाज को पहली मर्तबा जीवंत होते देखा।
इसलिए माता देवी भी पैदल ही पहुंचेगी छितकुल।
दंत कथाओं के अनुसार किन्नौर में सभी देवी देवता जब कहीं भी भ्रमण को जाते है तो उनके अपने मार्ग तय होते है। जिनको वे कभी नहीं छोड़ते है चाहे वो रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो। जो ये रास्ते है एक तो छोटा हो,दूसरा जो लोगों,स्थानीय देवी देवताओं से जुड़ा हो ताकि मेल मिलाप भी होता रहे। रास्ते ऐसे चुने जाते थे जो गांव के बीचों बीच से गुजरे चाहे उसमे खड़ी चढ़ाई हो। अब दिक्कत की बात एक तो ये है कि लोग पुराने रास्ते भुलाकर सड़क मार्ग को तवज्जों देते है। गांव स्वरूप में भी फर्क आया है सीमेंटेड स्ट्रक्चर खड़े हो गए है। तब तभी देवी देवता अपने पुराने रास्तों को कायम किए हुए है।आम लोगों के पुराने रास्ते या तो सड़कों के आने से बंद हो गए है या झाड़ियों से भर गए है। पुराने रास्ते देवी देवता ने नहीं छोड़े है और रूट कायम है।