
कांगड़ा जिला में महिलाओं के भूमि अधिकारों पर अध्ययन में सामने आई असमानताएं
भूमि एवं संपत्ति स्वामित्व में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित
IBEX NEWS BUREAU,शिमला
पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट (पीएमवीटी) द्वारा कांगड़ा जिला में महिलाओं के भूमि अधिकारों की स्थिति पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन कर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन आज यहां आयोजित किया गया जिसमें महिला आयोग की अध्यक्ष विद्या नेगी ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए विद्या नेगी ने कहा कि भूमि स्वामित्व महिलाओं को मिले इस दिशा में भविष्य में महिला आयोग जागरूकता अभियान चलाएगा। इसके लिए विशेष जागरूकता शिविर आयोजित होंगे जिसमें विशेषज्ञ महिलाओं को एवं समाज के अन्य वर्गों को जागरूक करेंगे। उन्होंने कहा कि भूमि और संपत्ति केवल आर्थिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का आधार भी हैं। आज भी समाज में महिलाओं की भूमि एवं संपत्ति स्वामित्व में भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित है जबकि महिलाओं का परिवार, कृषि और समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है, फिर भी संपत्ति पर उनका अधिकार अक्सर कम दिखाई देता है।


10 पंचायतों के 302 लोगों पर हुए अध्ययन में सामने आई लैंगिक असमानता; जलवायु परिवर्तन और सामाजिक परंपराएं भी बनीं बड़ी बाधा
कांगड़ा जिले की 10 पंचायतों में किए गए एक विस्तृत अध्ययन ने महिलाओं के भूमि और संपत्ति अधिकारों से जुड़ी चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है। 302 उत्तरदाताओं पर आधारित इस सर्वेक्षण में पाया गया कि आज भी अधिकांश संपत्तियों पर पुरुषों का वर्चस्व कायम है, जबकि महिलाओं की कानूनी जागरूकता और संपत्ति तक पहुंच बेहद सीमित है।
अध्ययन के अनुसार जिले में 76 प्रतिशत घरों का स्वामित्व पुरुषों के नाम दर्ज है, जबकि केवल 18 प्रतिशत घर महिलाओं के नाम हैं। नई संपत्तियों की खरीद में भी पुरुषों की भागीदारी 77 प्रतिशत रही, जबकि महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 17 प्रतिशत दर्ज की गई।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 32 प्रतिशत लोगों का मानना है कि पैतृक संपत्ति का प्रमुख उत्तराधिकारी पुत्र होना चाहिए, जबकि केवल 13 प्रतिशत लोगों ने पुत्रियों को प्राथमिक उत्तराधिकारी माना। परिवार की 63 प्रतिशत संपत्ति पुरुष मुखियाओं के नाम पाई गई, जबकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी पति की भूमिका अधिक प्रभावशाली रही।
महिलाओं की कानूनी जागरूकता की स्थिति और भी चिंताजनक पाई गई। सर्वेक्षण में शामिल 67 प्रतिशत महिलाएं भूमि संबंधी दस्तावेज पढ़ने और समझने में सक्षम नहीं थीं, जबकि केवल 4 प्रतिशत महिलाओं ने कभी भूमि अधिकारों से जुड़े किसी जागरूकता शिविर में भाग लिया था।
अध्ययन ने अनुसूचित जनजाति समुदाय की महिलाओं की स्थिति को विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बताया है। सर्वेक्षण में शामिल एसटी महिलाओं में केवल 17 प्रतिशत के पास ही घर का स्वामित्व पाया गया। रिपोर्ट के अनुसार वे पारंपरिक और कानूनी दोनों व्यवस्थाओं में समान अधिकारों से वंचित रह जाती हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी महिलाओं पर अधिक गंभीर पाया गया। 44 लोगों ने भूस्खलन, 43 लोगों ने प्रतिकूल मौसम और फसल क्षति के कारण खेती छोड़ने तथा 26 परिवारों ने प्राकृतिक आपदाओं के कारण भूमि या आवास खोने की जानकारी दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर भूमि अधिकारों वाली महिलाओं के लिए आपदाओं के बाद पुनर्वास और भी कठिन हो जाता है।
हालांकि राशन कार्ड, मनरेगा, जीवन बीमा और विधवा पेंशन जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ महिलाओं तक अपेक्षाकृत अधिक पहुंचा है, लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना में पुरुष लाभार्थियों की संख्या अधिक होने से संपत्ति स्वामित्व की खाई साफ दिखाई देती है।
अध्ययन का निष्कर्ष है कि महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के लिए केवल कानूनी अधिकार पर्याप्त नहीं हैं। सामाजिक सोच, पारिवारिक निर्णयों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और जागरूकता अभियानों में व्यापक बदलाव के बिना भूमि और संपत्ति में लैंगिक समानता हासिल करना मुश्किल रहेगा।

महिलाओं को भूमि और संपत्ति का स्वामित्व मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है तथा परिवार और समाज में उनका सम्मान भी बढ़ता है। शोध बताते हैं कि जिन महिलाओं के पास संपत्ति का स्वामित्व होता है, वे अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार के बेहतर भविष्य के लिए अधिक प्रभावी निर्णय ले पाती हैं।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि हम महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करें, उन्हें संपत्ति के स्वामित्व के लिए प्रोत्साहित करें और सामाजिक सोच में सकारात्मक बदलाव लाएं। बेटियों को भी परिवार की संपत्ति में समान अधिकार देना केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि हम सभी मिलकर ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें जहाँ महिलाओं को भूमि और संपत्ति पर समान अधिकार प्राप्त हो तथा वे आत्मविश्वास, सम्मान और स्वावलंबन के साथ राष्ट्र निर्माण में अपनी पूर्ण भागीदारी निभा सकें।
भूमि एवं संपत्ति अधिकारों में महिलाओं की भूमिका सीमित
पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट द्वारा कांगड़ा जिले में महिलाओं के भूमि अधिकारों की स्थिति पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार कानूनी प्रावधानों के बावजूद भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व, विरासत और निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है। अध्ययन का उद्देश्य महिलाओं के भूमि अधिकारों की वास्तविक स्थिति, विरासत संबंधी प्रथाओं, कानूनी जागरूकता तथा सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच का आकलन करना था।
10 पंचायतों के 302 लोगों पर किया अध्ययन
अध्ययन के तहत कांगड़ा जिला की 10 पंचायतों में 302 उत्तरदाताओं का सर्वेक्षण किया गया, जिनमें 73 प्रतिशत महिलाएं थीं। सर्वेक्षण में 66 प्रतिशत उत्तरदाता अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित थे।
घरों का 76 फीसदी स्वामित्व पुरुषों के नाम
अध्ययन में पाया गया कि 76 प्रतिशत घरों का स्वामित्व पुरुषों के नाम पर है, जबकि केवल 18 प्रतिशत घर महिलाओं के नाम दर्ज हैं। मात्र 6 प्रतिशत संपत्तियां संयुक्त स्वामित्व या अन्य श्रेणी में आती हैं। नई संपत्तियों की खरीद में भी पुरुषों की भागीदारी अधिक पाई गई, जहां 77 प्रतिशत खरीद पुरुषों द्वारा और केवल 17 प्रतिशत खरीद महिलाओं द्वारा की गई।
32 फीसदी लोगों ने माना पैतृक संपति पर पुत्र का हक
विरासत संबंधी धारणाओं में भी लैंगिक असमानता देखने को मिली। 32 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि पैतृक संपत्ति का मुख्य उत्तराधिकारी पुत्र होना चाहिए, जबकि केवल 13 प्रतिशत ने पुत्रियों को प्राथमिक उत्तराधिकारी माना। अध्ययन में यह भी सामने आया कि परिवार की 63 प्रतिशत संपत्ति पुरुष मुखियाओं के नाम पर है, जबकि विधवा महिलाओं के नाम पर 16 प्रतिशत संपत्ति दर्ज है। निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी पुरुषों का प्रभाव अधिक पाया गया। 37 प्रतिशत मामलों में पति को परिवार का प्रमुख निर्णयकर्ता माना गया, जबकि केवल 20 प्रतिशत मामलों में पत्नी की स्वतंत्र भूमिका सामने आई। शिक्षा एवं वित्तीय मामलों में संयुक्त निर्णय लेने की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक रही।
सरकारी योजनाओं की वजह से महिलाओं को मिलते अधिक अधिकार
सरकारी योजनाओं की पहुंच के संबंध में अध्ययन में पाया गया कि राशन कार्ड, मनरेगा, जीवन बीमा तथा विधवा पेंशन जैसी योजनाओं का लाभ महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक मिला है। हालांकि प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के लाभार्थियों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में काफी अधिक रही, जो संपत्ति स्वामित्व में मौजूद लैंगिक अंतर को दर्शाता है।
67 फीसदी महिलाएं भूमि संबधी दस्तावेजों को पढ़ने में सक्षम नहीं
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी रहा कि महिलाओं में भूमि अधिकारों संबंधी कानूनी जागरूकता का स्तर काफी कम है। 67 प्रतिशत महिलाएं भूमि संबंधी दस्तावेजों को पढ़ने और समझने में सक्षम नहीं पाई गईं, जबकि केवल 4 प्रतिशत महिलाओं ने कभी भूमि अधिकारों से संबंधित किसी जागरूकता शिविर में भाग लिया था।
दिव्यांगता और प्राकृतिक आपदा सबसे बड़ी बाधा
अध्ययन के अनुसार महिलाओं द्वारा बताई गई प्रमुख बाधाओं में दिव्यांगता और प्राकृतिक आपदाएं सबसे अधिक रहीं। 26-26 उत्तरदाताओं ने इन्हें भूमि अधिकारों में बाधा बताया, जबकि 12 लोगों ने आर्थिक कठिनाइयों, 6 ने सामुदायिक दबाव, 5 ने जातिगत कारणों और एक उत्तरदाता ने लैंगिक भेदभाव को प्रमुख अवरोध बताया। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि कई बार लोग गहरे सामाजिक एवं संरचनात्मक कारणों की बजाय प्रत्यक्ष समस्याओं को ही बाधा मानते हैं, जबकि वास्तविक असमानताओं की जड़ें पारंपरिक विरासत व्यवस्था और सामाजिक मान्यताओं में निहित हैं।
अध्ययन में अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय की महिलाओं की स्थिति को विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बताया गया है। सर्वेक्षण में शामिल 12 प्रतिशत एसटी महिलाओं में केवल 17 प्रतिशत के पास ही घर का स्वामित्व पाया गया। रिपोर्ट के अनुसार एसटी महिलाएं दोहरी चुनौतियों का सामना करती हैं, क्योंकि वे न केवल मुख्यधारा के कानूनी सुरक्षा प्रावधानों से बाहर रह जाती हैं, बल्कि पारंपरिक व्यवस्थाओं में भी उन्हें समान अधिकार नहीं मिल पाते।
43 लोगों ने प्रतिकूल मौसम के कारण छोड़ी खेती
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण करते हुए अध्ययन में पाया गया कि 44 लोगों ने भूस्खलन का अनुभव किया, 43 लोगों को प्रतिकूल मौसम और फसल क्षति के कारण खेती छोड़नी पड़ी, 30 लोगों ने पशुपालन छोड़ दिया तथा 26 परिवारों ने प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपनी भूमि अथवा आवास खो दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर भूमि अधिकार रखने वाली महिलाओं पर जलवायु आपदाओं का प्रभाव अधिक गंभीर पड़ता है और पुनर्वास योजनाओं में उनकी भागीदारी भी सीमित रह जाती है।
अध्ययन में प्रस्तुत केस स्टडीज से यह भी स्पष्ट हुआ कि महिलाओं के भूमि अधिकार केवल कानूनी प्रावधानों का विषय नहीं हैं, बल्कि सामाजिक मान्यताओं, पारिवारिक निर्णयों और संरचनात्मक सहयोग पर भी निर्भर करते हैं। कई महिलाओं ने बताया कि संपत्ति में उनका अधिकार होने के बावजूद सामाजिक दबाव और पारिवारिक अपेक्षाएं उन्हें अपने अधिकारों का उपयोग करने से रोकती हैं। वहीं कुछ मामलों में परिवार के सहयोग और जागरूकता ने महिलाओं को संपत्ति पर अधिकार प्राप्त करने और उसका प्रबंधन करने में मदद की।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि महिलाओं की कानूनी जागरूकता बढ़ाने, भूमि संबंधी दस्तावेजों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने, पंचायत स्तर पर सहायता तंत्र विकसित करने तथा जलवायु आपदाओं के बाद पुनर्वास नीतियों में महिलाओं के भूमि अधिकारों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में भी व्यापक बदलाव आवश्यक हैं।
वरिष्ठ पत्रकार अर्चना फुल ने कहा कि भूमि एवं संपति में महिलाओं के अधिकारों को लेकर जन आंदोलन की जरूरत है। हर व्यक्ति को इसके बारे में जागरूक होना होगा तभी समाज में बदलाव आएगा। पितृसत्ता की प्रथा आज के वक्त में बदल रही है। आज जब महिलाएं अपने मायके में भूमि पर हक जताने लगती है तो उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कई रिश्ते टूटने की कगार पर पहुंच जाते है। कई बहने भाइयों से भूमि लेना ही नहीं चाहती है ताकि उनके रिश्ते के कोई दरार न आए। कई जगह पर ससुराल में महिलाओं की स्थिति बहुत खराब है। अगर उन्हें पैतृक संपति में हक मिले तो अपने बच्चों का पालन पोषण और अपने जीवन को सही दिशा देने में अहम भूमिका हो सकती है। मां-बाप को भी सोचना होगा कि बेटों की तरह बेटियों का भी संपति में हक है और वो हक हर हाल में देना है।
इस दौरान पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट पालमपुर की संस्थापक रजनी व्यास, एकल नारी संगठन की संस्थापक निर्मल चंदेल, एवजिन फाउंडेशन की निदेशक डॉ निशा सिंह, संघपाल संस्थापक मुक्ति प्रोजेक्ट, चेयरपर्सन पीएमवीटी बिमला विश्वप्रेमी, प्रोग्राम मैनेजर शालिनी सहित अन्य गणमान्य भी मौजूद रहे।
-०-




