
न्याय’ के नाम पर ‘जल्दबाजी’ का खेल! 3 दिन में डॉक्टर का करियर निबटा दिया , लात बरसाने वाले मरीज पर तंत्र खामोश
मुख्यमंत्री बोले—SR शिप की ड्यूटी घंटे घटाए, स्टाइपेंड बढ़ाया फिर भी
डॉक्टर की ऐसी हरकत, लेकिन डॉक्टरों की सुरक्षा भी ज़रूरी
IBEX NEWS,शिमला ।
हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल IGMC शिमला में सामने आए विवादित मामले पर सरकार ने कार्रवाई पूरी कर दी है, जबकि प्रारंभिक जांच को लेकर सवाल अभी भी बने हुए हैं।सरकार का ‘बुलेट ट्रेन’ की रफ्तार से आया फैसला न्याय के नाम पर ‘जल्दबाजी’ का खेल माना जा रहा है और मरीज पर मेहरबानी सीधे सीधे पंचायतीराज चुनावों से जोड़कर देखी जा रही है ऐसे में जब 3 दिन में डॉक्टर के करियर पर सरकार ने निर्णय सुना दिया और लात बरसाने वाले मरीज पर तंत्र खामोशी अपनाए हुए हैं ।महज़ 72 घंटे… जी हां, सिर्फ तीन दिन के भीतर सरकार ने जिस ‘आनन-फानन’ में सीनियर रेजिडेंट डॉ. राघव निरुला की सेवाएं समाप्त करने का ‘तुगलकी फरमान’ सुनाया है, उसने पूरी चिकित्सा बिरादरी को उबाल कर रख दिया है। सवाल सीधा है— जब सरकारी जांच खुद मान रही है कि कसूरवार डॉक्टर और मरीज ‘दोनों’ हैं, तो सजा की गाज सिर्फ डॉक्टर पर ही क्यों गिरी? क्या ऑन-ड्यूटी डॉक्टर पर लात बरसाने और IV स्टैंड पकड़कर डॉक्टर पर लाते चलाने वाले मरीज को क्या ‘सरकारी अभयदान’ मिला हुआ है?


क्या कोई कार्यवाही होगी जिन्होंने हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया, कैमरे के सामने जान से मारने की धमकियाँ दीं, भीड़ को उकसाया और पूरे अस्पताल को बंधक बनाकर रखा — या इनके लिए कोई कानून नहीं है?
कानून पूरी तरह मौजूद है और ऐसे कृत्य गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं। लागू होने वाली प्रमुख धाराएँ इस प्रकार हैं—
IPC धारा 141–149 – गैरकानूनी जमावड़ा और सामूहिक अपराध
141: गैरकानूनी जमावड़ा
147/148: दंगा / घातक हथियार के साथ दंगा
149: जमावड़े के सभी सदस्य सामूहिक अपराध के दोषी
IPC धारा 503/506 – आपराधिक धमकी
कैमरे के सामने जान से मारने की धमकी देना स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध है।
IPC धारा 353 – सरकारी कर्मचारी को कर्तव्य से रोकने हेतु हमला या आपराधिक बल
डॉक्टर/रेज़िडेंट सरकारी ड्यूटी पर हों तो यह धारा सीधे लागू होती है।
IPC धारा 332 – सरकारी कर्मचारी को कर्तव्य से रोकने के लिए चोट पहुँचाना
यदि किसी डॉक्टर/स्टाफ को शारीरिक चोट लगी हो।
IPC धारा 341/342 – अवैध रूप से रास्ता रोकना / बंधक बनाना
अस्पताल को घेरना, आवागमन रोकना, स्टाफ को बाहर न जाने देना।
IPC धारा 188 – वैध आदेश की अवहेलना
यदि निषेधाज्ञा/प्रशासनिक आदेश के बावजूद भीड़ जुटी हो।
IT Act, 2000 – धारा 67/69A (परिस्थिति अनुसार)
सोशल मीडिया/डिजिटल माध्यम से उकसावे या धमकी के प्रसार पर।
राज्य का Hospital/Medicare Service Persons Protection Act
अस्पताल में हिंसा, तोड़फोड़, धमकी या बाधा पर विशेष दंड का प्रावधान।
कैमरे पर दी गई धमकियाँ और भीड़ को उकसाने के दृश्य ठोस साक्ष्य हैं। कानून की कमी नहीं है; प्रश्न केवल यह है कि क्या इन धाराओं को निष्पक्ष रूप से लागू किया जाएगा, या नहीं।credit:social media
हैरानी की बात है कि जिस जांच में कम से कम 7 दिन का समय लगना चाहिए था, उसे छुट्टियों के माहौल में नियमों को ताक पर रखकर 3 दिन में ही निपटा दिया गया। ‘नेचुरल जस्टिस’ की धज्जियां देखिए— न तो डॉक्टर को ‘शो कॉज नोटिस’ दिया गया और न ही थ्रू प्रॉपर चैनल डॉक्टर को सफ़ाई पेश करने का समय और मौक़ा दिया गया । बिना सुनवाई सीधे सजा? यह कैसा न्याय है?
डॉक्टरों का गुस्सा जायज है। वायरल वीडियो और चश्मदीद गवाह बता रहे हैं कि मरीज ने पहले बदसलूकी की, डॉक्टर को लातें मारीं और अस्पताल की संपत्ति (IV स्टैंड) को हथियार बनाया। अगर डॉक्टर ने बचाव में मरीज का ‘जोश ठंडा’ न किया होता, तो शायद वहां मौजूद नर्सिंग स्टाफ लहूलुहान होता। डॉक्टर कोई ‘सैंडबैग’ नहीं है जो मार खाता रहे और मुस्कुराता रहे; डॉक्टर भी आखिर इंसान है।दबी जुबान में चिकित्सक के विभिन्न संगठन SAMDCOT,RDA और HMOA कह रहे हैं ।मीडिया को जारी बयान में चिकित्सक संगठन ने आंदोलन तक करने की चेतावनी दी है ।

तर्क ये कि कार्रवाई एकतरफा रही है तो यह फैसला प्रदेश के डॉक्टरों के मनोबल पर एक गहरा तमाचा है ।चिकित्सकों का मानना है कि इतनी कम अवधि में नियमों से परे जाँच कैसे पूरी हुई?सीमित तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया निर्णय जल्दबाजी में लिया गया है ।कम से कम सात दिन की अवधि प्रारंभिक जाँच में समय दिया जाना चाहिए था और तीन दिन में ही केस निपटाते हुए चिकित्सक के कैरीअर को आनन फानन में निबटा देने के सरकार पर चिकित्सक उग्र हो गए हैं ।सूचना है कि सरकारी स्तर पर चिकित्सक का नियमों से पक्ष नहीं सुना गया ।पल्मोनरी विभाग के विभागाध्यक्ष ,आईजीएमसी प्रशासनिक अधिकारियों और संबंधित जांच कमेटी सदस्यों ने स्पष्टीकरण बतौर पेश करने के लिए तय अवधि नियमानुसार नहीं रखी ।इससे भी हैरानी जनक पहलू यह कि सरकार द्वारा चिकित्सक को दोषी करार देने से पहले चिकित्सक पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए शो कॉज नोटिस तक देने की जहमत नहीं उठाई गई।घटना के महज़ तीन दिन के भीतर सरकार ने पूरे मामले में चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशालय (DME) हिमाचल प्रदेश ने प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर पल्मोनरी मेडिसिन विभाग में तैनात सीनियर रेजिडेंट डॉ. राघव निरुला की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का फ़रमान सुना दिया ।कहा कि निदेशालय द्वारा 24 दिसंबर 2025 को जारी आदेश के अनुसार, 22 दिसंबर को IGMC में मरीज अर्जुन (36 वर्ष) और डॉ. राघव निरुला के बीच हुए विवाद की जांच के लिए गठित अनुशासनात्मक समिति की रिपोर्ट में पाया गया कि घटना के लिए मरीज और डॉक्टर—दोनों जिम्मेदार हैं। जांच में इस घटना को कदाचार, दुर्व्यवहार, लोक सेवक के अनुरूप न होने वाले आचरण और रेजिडेंट डॉक्टर पॉलिसी 2025 के उल्लंघन की श्रेणी में रखा गया है। गौर करने वाली बात ये है कि यदि जाँच में दोनों को दोषी ठहराया गया है तो कार्यवाई एकतरफा क्यों?डॉक्टर को ही सजा क्यों?डॉक्टरों का कहना है कि यदि मरीज भी दोषी है तो ऑन ड्यूटी डॉक्टर पर लातें बरसाने वाले मरीज के लिए भी डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए बने नॉनबैलेबल ऑफेंस कानून से शिकंजा कसा जाए और सरकारी अस्पताल में भर्ती होने के दौरान मरीजों को क्या करना है क्या नहीं और तीमारदारों की तादात कितनी हो इन सब के लिए जो नियम निर्धारित है उसके दायरे में सरकार नियमों के अनुसार मरीज पर भी कार्यवाई करे ।ये भी जगजाहिर करें कि सरकार ने चिकित्सक के साथ मरीज को भी दोषी ठहराया है तो मरीज के क्या क्या दोष जाँच कमेटी ने पाए हैं । ताकि आने वाले समय में अस्पतालों में आनेवाले मरीजों के लिए गाइडलाइन तैयार हो सके । वर्तमान में इस संबंधी क्या मापदंड हैं ?और क्या अपनाए जा रहे हैं ?स्पष्ट नहीं हैं । मरीजों की चाल ढाल देखकर रूख अख्तियार होते रहें है कि मरीज और तीमारदारों का वार्ड में क्या अनुपात है और मिलने की टाइमिंग क्या है ? मरीज या उसके तीमारदारों को दूसरे मरीजों के स्वास्थ्य को हाशिए पर धकेलते हुए क्या वीडियो बनाना,हंगामा और सरकारी सामान को तोड़फोड़ करना अलाउड है?आरोप है कि मरीज ने डॉक्टर को गर्ममिजाजी दिखाई और लातें जड़ी तो ऐसे में चिकित्सक चुपचाप खड़े रहकर मरीज की मार कैसे खा सकता था ।वायरल वीडियो में भी मरीज की बदसलूकी जगजाहिर हुई है ।चिकित्सक ने बचाव में ऐसा किया क्योंकि मरीज के हाथ में आईवी स्टैंड था अगर चिकित्सक बचाव में मरीज का जोश ठंडा न करता तो हो सकता था स्टाफ पर गुस्सा फूटता ।डॉक्टर भी आख़िर इंसान है ।
विवाद पर मुख्यमंत्री ने विस्तृत प्रतिक्रिया देते हुए अनौपचारिक तौर पर पत्रकारों से बातचीत में बताया है कि जिन भी परिस्थितियों में मरीज के साथ यह घटना हुई, ऐसा किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिए था। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि डॉक्टर ने जो किया, वह गलत था और इसी दृष्टि से कार्रवाई की गई है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार पहले ही सीनियर रेजिडेंट (SR) डॉक्टरों के कार्यभार और तनाव को कम करने के लिए कई सुधार कर चुकी है। पहले जहां 48-48 घंटे की ड्यूटी दी जाती थी, उसे संशोधित कर अब SR शिप में 12 घंटे की ड्यूटी व्यवस्था लागू की गई है। इसके साथ ही SR डॉक्टरों का स्टाइपेंड 65 हजार रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये किया गया है, ताकि उन पर काम का दबाव कम हो।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इन सुधारों के बावजूद ऐसी घटना होना वह समझ नहीं पाए। उन्होंने कहा कि साधारण परिवारों से आने वाले मरीज अच्छे इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल आते हैं। संबंधित मामले में मरीज पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के खाली बेड पर बैठ गया था, जो तबीयत खराब होने की स्थिति में सामान्य बात हो सकती है।
उन्होंने बताया कि मरीज के लेटने के बाद एक वीडियो सामने आया, जिसमें डॉक्टर द्वारा हमला करते हुए देखा गया। डॉक्टरों की ओर से यह भी कहा गया कि उनके पास भी एक वीडियो है, जिस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि चाहे कोई भी स्थिति हो, इस तरह की हरकत उचित नहीं है। यदि कोई शिकायत है तो उसे विधिवत दर्ज कराया जा सकता है। इसी आधार पर IGMC प्रशासन की रिपोर्ट पर सरकार ने कार्रवाई की।
मुख्यमंत्री ने कहा कि IGMC के डॉक्टरों को किस प्रकार सुरक्षा प्रदान की जाए, इसके लिए अधिकारियों को अध्ययन करने के निर्देश दिए गए हैं। अस्पताल में मरीज के साथ कितने तीमारदार जा सकते हैं, इस पर भी नीति बनाने की जरूरत है। उन्होंने दोहराया कि डॉक्टरों को भी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

डॉक्टर संगठनों की ओर से आंदोलन की चेतावनी पर पूछे गए सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉक्टरों की बात सुनी जाएगी और सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है।




