
IBEX NEWS,शिमला ।
HPPCL चीफ इंजीनियर विमल नेगी की रहस्यमयी मौत का सच्च “खाकी “ ही खा गई ।मामले पर अभी तक की तमाम जाँच स्टेटस रपटों में यहीं खुलासा हुआ है जिससे न्याय की उम्मीद में बैठे परिजन “सिस्टम की मौत” का जनाजा देखकर खून के आँसू रोने को विवश है ।विमल नेगी की रहस्यमयी मौत की जाँच का ज़िम्मा संभालने वाली पुलिसिया खाकी वर्दी रक्षक नहीं अपितु भक्षक की भूमिका निभाती रही ।मामले की जाँच के लिए गठित एक SIT के एएसआई पंकज ने विमल नेगी की डेड बॉडी से पेन ड्राइव छुपाई और अहम सबूत नष्ट किए यानी डेटा डिलीट करने के लिए फ़ॉर्मेट कर दिया।बिलासपुर में ASI पंकज ने पेन ड्राइव छिपाई। यह पेन ड्राइव विमल नेगी के पास थी, जो उनके लैपटॉप से जुड़ती थी ।ये चौकाने वाला कटु सत्य काल्पनिक नहीं है बल्कि सत्य घटना पर आधारित है ।शिमला पुलिस की जांच पर DGP ने सवाल उठाते हुए हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को बाकायदा शपथ पत्र पेश करते हुए तथ्य पेश किए हैं ।ये सब किसे बचाने के लिए ASI ने किया?किसके इशारे पर क्यों किया ? रहस्यमयी मौत के पीछे कौन /क्या साजिश है?हत्या है या सुसाइड है ? विमल नेगी के परिजन ऐसे उलझे सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए दर दर भटक रहे हैं और पुलिस ने डेडबॉडी से मिले अहम सबूतों को ही निगल लिया ।क्रूशल एविडेंस प्रीजर्व नहीं किए गए। डीजीपी के एफिडेविट में भी ये चीजें हाईलाइट हुई हैं। DGP और एसपी शिमला के बीच की खाई की कलई खुली इस तरह सरकार में किस स्तर पर क्या चल रहा है ? वो सब कुछ अदालत में सामने आ गया। डीजीपी-एसपी की रिपोर्ट पर विरोधाभास है। वह जांच पर सवाल उठा रही है।डीजीपी अतुल वर्मा ने रपट में पैन ड्राइव को फार्मेट कर सबूत से छेड़छाड़ करने का जिक्र किया है अर्थात्त तफ्तीश में गड़बड़ है ।
एसपी पर डीजीपी को रिपोर्ट्स न देने का आरोप लगाए यानी पुलिस में उनकी अधिकारी नहीं सुन रहे हैं ।डीजीपी अतुल वर्मा की ओर से बीते रोज अदालत में दायर की गई स्टेटस रपट में एसपी शिमला पर इल्जाम लगाए हैं ।इस पर SP शिमला संजीव गांधी ने ख़ुद अदालत में समझाने की कोशिश की कि उन्होंने खुद इसका पता लगाया कि पंकज ने पेन ड्राइव जेब में रख दी थी। इसके बाद उसे सस्पेंड किया गया।अपने वरिष्ठ अधिकारी हिमाचल प्रदेश डीजीपी को लेकर sp के शिकायती लहजे को भांपते हुए हाई कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की और अनुशासनहीनता पर एसपी को पाठ पढ़ाया ।कहा कि मामले की गहनता से जांच की बजाय आप लोग अपनी लड़ाइयों में लड़ते रहो ।कैसे एसपी शिमला अपने वरिष्ठ अधिकारियों या पुलिस के सबसे बड़े अधिकारी के बारे में अदालत में खड़े होकर बात कर रहे है ये अनुशासनहीनता है ये दोनों के बीच की समस्या है।न तो यहाँ डीजीपी को क्लीन चिट दी जा रही है न ही एसपी को ब्लेम किया जा रहा हैमगर आप लोगों के पर्सनल इशू में ये लोग रगड़े गए यानि तफ्तीश हाशिए पर है।तो ऐसे में क्यों न ये जाँच सीबीआई को सौंपी जानी चाहिए और वे सारे मामले की जांच करें ? इस पर हालांकि सरकार ने पक्ष रखा कि जाँच में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है ।प्रदेश सरकार के महाधिवक्ता अनूप रतन ने अदालत में कहा कि एसआइटी इस मामले की सही तरीके से जांच कर रही है और अगर इस मामले को सीबीआई के सुपुर्द किया जाता है तो इससे प्रदेश पुलिस का ‘मौराल ‘यानी आत्मबल कमजोर होगा। उन्होंंने इस मामले को सीबीआई के सुपुर्द करने का विरोध किया। सरकार की ओर से अदालत को दो रिपोर्ट सौंपी गई हैं। एक अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह ओकार चंद शर्मा की प्रशासनिक जांच रिपोर्ट है तो दूसरी पुलिस की ओर से 134 पृष्ठों की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट दी गई है। अदालत ने इन दोनों जांच रिपोर्ट को अपने रिकॉर्ड में रख लिया है।
- डीजीपी अतुल वर्मा ने बीते रोज दायर अपनी रपट में बेहद संगीन इल्जाम एसपी शिमला और विमल नेगी की मौत के पीछे के कारणों की जांच करने के लिए गठित एसआइटी पर लगा दिए थे।डीजीपी अतुल वर्मा ने अपनी स्टेटस रपट में कहा था कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद उन्होंने तीन मई और छह मई को एसपी शिमला को चिटठी लिख कर जांच अधिकारी के साथ तमाम संबधित फाइलों डीजीपी को भेजने को लिखा था।लेकिन एसपी शिमला ने 7 मई तक कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नवदीप सिंह को केस फाइल के साथ आठ मई को हाजिर होने का निर्देश दिया।इसी तरह एसआइटी के सदस्य डीएसपी शक्ति सिंह और इंस्पेक्टर मनोज कुमार को भी डीजीपी के समक्ष हाजिर होने को कहा गया। एसपी की ओर से कोई जवाब न मिलने पर सात मई को एसएफएल जुन्गा की निदेशक को तमाम रपटों को नौ मई को डीजीपी को मुहैया कराने का आग्रह किया गया ताकि हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन किया जा सके।
- इस बीच 7 मई को डीआइजी दक्षिणी रेंज अंजुम आरा की ओर से एक चिटठी मिली जिसमें कहा गया कि गुम हुए पैन ड्राइव को लेकर एसपी की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया हैं। इसके बाद आठ मई को एसपी शिमला की ओर ये एक चिटठी भेजी गई जिसमें एसपी ने जांच अधिकारी को दस्तावेजों के साथ डीजीपी के समक्ष हाजिर होने की इजाजत देने में असमर्थता जताई हैं।एसपी ने साथ ही ये भी लिखा कि मामले की जांच में प्रगति रपट पहले ही डीआइजी के मार्फत भेज दी गई हैं। डीजीपी ने अपनी स्टेटस रपट में लिखा कि केस फाइलों, केस डायरियों और संबधित दस्तावेजों की पड़ताल किए बगैर स्वतंत्र रपट तैयार नहीं की जा सकती थी।
- इसके बाद एसपी शिमला ने आठ मई को एसएफएल जुन्गा की निदेशक को ये लिखा की जांच अधिकारी के सिवाय किसी और को रपटों को न दिया जाए। डीजीपी अतुल वर्मा ने हाईकोर्ट को बताया की एसपी शिमला ने हर कोशिश की कि उन तक रपटें न पहुंचे।लेकिन दस मई को निदेशक एसएफएल की ओर उन्हें रपटें भेज दी गई।
- इन रपटों में एक रपट पैन ड्राइव के डेटा की थी। जिसमें कहा गया था कि ये पूरी तरह से ब्लेंक थी लेकिन बाकी तकनीकों का इस्तेमाल कर जो डेटा निकाला गया उससे पता चला कि इस पैन ड्राइव को 21 मार्च को ही फार्मेट कर दिया गया था। डीजीपी ने अपनी रपट में कहा कि एसआइटी के स्तर पर ये भारी कदाचार है।मृतक के शव के साथ ये पैन ड्राइव मिला था जो कि एक महत्वूपर्ण सबूत था लेकिन इसके साथ छेड़छाड़ कर दी गई और इसे जब्त करने के बाद सबूतों को नष्ट कर दिया गया।
इसी को लेकर आज महाधिवक्ता अनूप रतन ने साफ किया कि डीजीपी ने 10 मार्च को लापता हुए विमल नेगी की तलाश के लिए जो 15 मार्च को एसआइटी गठित की थी, ये पैन ड्राइव उसी के पास होना चाहिए था। जिस एएसआइ ने इसे अपने पास रख लिया था और फार्मेंट कर लिया तक तक सब कुछ डीजीपी और उनकी ओर से गठित एसआइटी के नियंत्रण में थी और उन्हीं को रिपोर्ट भी कर रही थी।18 मार्च को विमल नेगी की लाश मिलने के बाद दूसरी एसआइटी गठित की गई उसने ये पैन ड्राइव हासिल की और उसे एफएसएल जुन्गा को भेजा।अब इस मामले को सीबीआई को भेजा जाना है या नहीं इस पर अदालत के फैसले का इंतजार हैं।
पुलिस ने दो अलग-अलग स्टेटस रिपोर्ट दायर की हैं। महाधिवक्ता अनूप रतन ने अदालत को बताया कि इन दोनों रिपोर्ट के बारे में सरकार को पता नहीं है। सरकार निष्पक्ष जांच चाहती है। सरकार अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह ओंकार शर्मा की रिपोर्ट को समय आने पर सार्वजनिक तौर पर स्वयं पेश करेगी, जिससे परिजनों को न्याय मिले और जिन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, उसमें भी निष्पक्षता हो ।
- महाधिवक्ता अनूप रत्न ने जानकारी दी कि विमल नेगी के लापता होने पर डीजीपी ने एक एसआईटी गठित की थी। दूसरी एसआईटी सरकार की ओर से विमल नेगी की मौत के बाद गठित की गई। डीजीपी की ओर से गठित एसआईटी के एक अधिकारी ने पेन ड्राइव छुपा लिया था। इसे सरकार की ओर से गठित दूसरी एसआईटी ने अपने कब्जे में कर दिया।उन्होंने कहा, 15 मार्च को डीजीपी की ओर से पहली एसआईटी गठित की गई। 18 मार्च को बिलासपुर में ASI पंकज ने पेन ड्राइव छिपाई। यह पेन ड्राइव विमल नेगी के पास थी। इसमें मौजूद 15 हजार डॉक्यूमेंट रिकवर कर दिए हैं।इससे पहले बीते रोज भी महाधिवक्ता ने इस मामले में अतिरिक्त मुख्य सचिव ओंकार शर्मा की रपट याचिकाकर्ता के साथ साझा करने का भी विरोध किया था। उन्होंने दलील दी थी कि ये रपट अभी भी सरकार के विचाराधीन हैं। ये रपट अदालत में पेश कर दी गई और इसे अदालत ने देख भी लिया। ।
- उधर महाधिवक्ता की ओर से डीजीपी अतुल वर्मा और अतिरिक्त मुख्य सचिव ओंकार शर्मा की ओर से पैरवी नहीं की। अदालत में महाधिवक्ता ने कहा कि इनकी रपटें उनसे यानी महाधिवक्ता से वेट या तस्दीक नहीं कराई गई हैं। महाधिवक्ता ने केवल एसपी शिमला व उनकी एसआईटी की ओर से इस मामले में पैरवी की।कारपोरेशन के पूर्व चीफ इंजीनियर विमल नेगी की रहस्यमय मौत की जांच सीबीआई को जाएगी या नहीं इस बावत प्रदेश हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया हैं।




