शाही प्रतिनिधि देव कलम सिंह और छत्र सिंह भी बायोलिंग में पहुंचे ,इस पवित्र आयोजन को संपन्न करवाने में रहती है अहम भूमिका ।
IBEX NEWS,शिमला
आस्था और परंपरा की भूमि छितकुल में इस वर्ष का बायलिंग उत्सव एक बार फिर ऐतिहासिक क्षण बना,जब कामरू के अधिष्ठाता देव बद्रीविशाल अपनी अर्धांगिनी छितकुल माता देवी से मिलने पहुंचे ।उनके साथ शाही प्रतिनिधि कलम सिंह तथा छत्र सिंह मौजूद रहे और एक जमाने से चली आ रही प्रथा में तीन वर्षों बाद छितकुल की आराध्य माता देवी से पति बद्री विशाल भव्य रूप में मिले।देव दंपति का यह मिलन किसी सांसारिक भेंट से कहीं अधिक है — यह देव संस्कृति की जीवंत धारा है, जो सदियों से स्थापित धार्मिक परंपराओं और निश्चित मार्गों पर आधारित है।भारी जनसमूह श्रद्धा और उल्लास से देवताओं के इस मिलन का साक्षी बनने के लिए पहुंचे हैं । श्रद्धा और उल्लास से परिपूर्ण इस देव मिलन में पूरे गांव में भक्ति और आनंद की लहर है।अपने पतिदेव के आगमन पर सोलह श्रृंगार किए माता छितकुल देवी सम्पूर्ण सृष्टि को आशीर्वाद देती हैं और प्रांगण में पति के साथ मेला (देव नृत्य ) कर ख़ुशी प्रदर्शित करती हैं ।छितकुल की देवी गृहस्थ है और उन्होंने कामरू बद्रीनाथ देवता से विवाह किया है ।बटसेरी के बद्रीनाथ ,कामरू के बड़े भाई माने जाते हैं।इसलिए छितकुल की देवी बटसेरी के बद्रीनाथ को अपना ज्येष्ठ मानती हैं । माता देवी की एक पुत्री शुचि माँ आपी है जिनका विवाह छितकुल के कंडे (जहाँ भेड़ बकरियों का डेरा ) के निवास करने वाले कारूदेव के साथ हुआ है ।इसलिए देवी कारुदेव को अपना दामाद बताती है । कारुदेव का जिक्र इसलिए किया कि उनकी अनुमति बायोलिंग में कामरू के देवताओं को प्रवेशद्वार पर जरूरी है क्योंकि कारु देव छितकुल की माटी के स्थानीय देव है इसलिए माता देवी के मंदिर प्रांगण में प्रवेश से पहले बद्रीविशाल देवता को गांव के स्थानीय देवता से मुख्यद्वार पर प्रवेश करने के लिए इस बार भी अनुमति लेनी पड़ी ।हालांकि किन्नौर की देवियों में सबसे शक्तिशाली देवी माता छितकुल देवी “माथी “ ही है जो वृंदावन से यहाँ आई थी । ऐसा माना जाता है कि उन्होने बद्रीनाथ से विवाह किया था और बाद में वे छितकुल में बस गयी ।कामरू के बद्रीविशाल न केवल एक शक्ति का प्रतीक हैं, बल्कि एक संस्कृति के संरक्षक मामा भी हैं — जो देव परिवार को जोड़कर रखते हैं,उन्हें श्री विष्णु का अवतार माना जाता है। कामरु गांव को यहां की स्थानीय बोली में ‘मोने’ कहा जाता है और इस गाँव में बुशहर के दो स्वर्गीय राजाओं छत्र सिंह और कल्याण /कलम सिंह को स्थानीय देवों के रूप में पूजा जाता है । देव कलम सिंह और देव छत्र सिंह दोनों देवता कोई सामान्य नाम नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतीक हैं।
कलम सिंह को ज्ञान, न्याय और लेखन का प्रतीक माना जाता है। नाम में ‘कलम’ एक गहरे अर्थ को समेटे हुए है — यह शिक्षा, नीति और निर्णय का संकेत देता है। लोक मान्यता के अनुसार, कलम सिंह वह देव हैं जो सत्य बोलने, निर्णय लेने और समाज को दिशा देने में सहायक हैं। बद्रीविशाल उनके मामा हैं, जो मार्गदर्शक और संरक्षक की भूमिका में रहते हैं। कलम सिंह को आमतौर पर गंभीर, अनुशासित और धर्मनिष्ठ माना जाता है।छत्र सिंह का नाम ‘छत्र’ यानी छाया या सुरक्षा से लिया गया है। वह उस रक्षक देवता का रूप हैं जो संकट के समय में अपने लोगों को संरक्षण देते हैं। छत्र सिंह का व्यक्तित्व लोक परंपरा में वीरता, सुरक्षा और संवेदनशीलता से जुड़ा माना जाता है।
छत्र सिंह भी बद्रीविशाल के भांजे माने जाते हैं, यानी पारिवारिक संबंधों में श्रद्धा और सेवा के भाव के साथ जुड़े हुए हैं।
वे युद्ध, संघर्ष या सामाजिक संकट के समय में संरक्षक शक्तियों के रूप में याद किए जाते हैं।
तीनों देवताओं के बीच संबंध का गूढ़ अर्थ:
- बद्रीविशाल = आध्यात्मिक मूल, मार्गदर्शन और संरचना का प्रतीक (मामा)।
- कलम सिंह = ज्ञान, नीति और निर्णय शक्ति (भांजा – बुद्धि)।
- छत्र सिंह = संरक्षण, शक्ति और सुरक्षा (भांजा – वीरता)।
यह संबंध मानव समाज की आदर्श संरचना को दर्शाता है — जहाँ मार्गदर्शक (मामा) संतुलन बनाए रखते हैं, एक भांजा बुद्धि से तो दूसरा भांजा शक्ति से समाज को संभालता है। यह देव संबंध पारिवारिक भावनाओं, जिम्मेदारी और संतुलन का जीवंत प्रतीक है।किन्नौर के देवी देवता भी आपस में सगी संबंधी है, कोई किसी का पुत्र है, तो कोई किसी का मामा-भांजा। मनुष्य की तरह यहाँ भी देवी देवताओं के बीच रूठने मनाने का सिलसिला देखने को मिलता है।
एक किंवदंती के अनुसार कुप्पा और सांगला गांव में पहले एक बहुत बड़ी झील हुआ करती थी। इसमें देवता बैरिंगनाग, कमरुनाग और बद्री विशाल का प्रभुत्व था। झील को हटाने के लिए योजना के अनुरूप देवता बैरिंगनाग ने सांप और बद्री विशाल ने चूहे का रूप धारण किया और झील के धरातल में कई सुराख करके झील को खत्म कर दिया। झील के खत्म होने के बाद से यह क्षेत्र मैदानी और बेहद खूबसूरत दिखने लगा। इसे पाने के लिए दोनों देवताओं में जंग छिड़ गई जिसमें बैरिंग नाग विजयी हुए और उन्होंने देव बद्रीविशाल को इस जगह से जाने को कहा। कहा जाता है कि दोनों देव समझौते के अनुसार फिर देव बद्रीविशाल कामरु गांव की इस चोटी में बस गए। कमरुनाग पानी में रहना पसंद करते थे और जब इस जगह झील ही नहीं रही तो उन्होंने जिला मण्डी की सरनाउली नामक जगह में खुद को व्यवस्थित किया, यह स्थान आज कामरु नाग के नाम से विख्यात है। कामरु किला पहले रामपुर बुशहर रियासत का अंगभूत भाग था।राजाओं के समय बुशहर राजा किसी अत्यधिक शक्तिशाली देवता को पूरे परगने में घूमने को कहते थे जिसे बोनिंग कहते थे । किन्नौर में देवी देवताओं का स्थानीय लोगों पर बड़ा प्रभाव है और कोई अवहेलना नहीं करता और ये देव देवियां अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं और इसी दौरान गांव के हर परिवार में से एक व्यक्ति साथ जाता है ।पूरा बजन्त्री दल और जिससे मिलने देवता जाते हैं उनके लिए उपहार गागोरो यानी विशेष कपड़ा आदि ले जाते हैं और आतिथ्य में गए देवता मंदिर प्रांगण में ठोकरी कायांग या पनस कायंग विशेष नृत्य करते हैं । देवी देवता द्वारा अपने अपने रिश्तेदारों के यहाँ मेहमानी करने जाने को स्थानीय बोली में बायलिंग कहते हैं और छितकुल में देव मिलन बायोलिंग हो रहा है ।
कलम सिंह और छत्र सिंह ने सदियों से चली आ रही इस परंपरा के आयोजन की अगुवाई करते रहे हैं ।
इस शुभ अवसर पर कलम सिंह देव और छत्र सिंह भी विशेष रूप से साथ में आते हैं , जो परंपरागत नियमों का पालन करते हुए इस पवित्र आयोजन को संपन्न करवाने में अहम योगदान देते हैं ।सोमवार शाम के समय, कलम सिंह ने घोषणा की कि सभी श्रद्धालु रात का भोजन करने के बाद मंदिर प्रांगण में मेला करेंगे । यह परंपरा हर तीन वर्षों में देव मिलन के उपलक्ष्य में निभाई जाती है।इस मौके पर आस-पास का वातावरण देवध्वनि, ढोल-नगाड़ों और श्रद्धा से गूंज उठा ।विशेष बात यह रही कि देव दंपत्ति मंदिर के भीतर विश्राम हेतु चले गए, जबकि कलम सिंह स्वयं चबूतरे पर विराजमान रहे और उन्होंने समस्त आयोजन की देखरेख की। मंदिर प्रांगण में रणभेरी, नगाड़े और देव वाद्य बजते रहे — और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य कर देव आभार प्रकट किया।मंगलवार को माता देवी ने अपनी और से धाम की घोषणा की तो बायोलिंग का उत्सव की अवधि एक दिन बढ़ गई जबकि आज पति देव कामरू की वापसी तय की थी ।
बायलिंग उत्सव के अंतर्गत हर तीन वर्षों में यह देव मिलन होता है, और अगली बार अब माता देवी अपने पति के पास जाएंगी। इस यात्रा के लिए मार्ग और विधियां पूर्व निर्धारित हैं, जो सदियों से अखंडित और शुद्ध परंपराओं के अनुसार अपनाई जाती हैं।
पाँच दिवसीय बायलिंग उत्सव की ऐसी पावन घड़ी जो बीते शनिवार से शुरू हुई हर तीन वर्षों के बाद आती है — जब देवी और देव अपने निर्धारित मार्ग से चलकर पुनः एक-दूसरे से मिलते हैं, और सम्पूर्ण घाटी श्रद्धा की ध्वनि से भर जाती है।इस दिव्य मिलन में, जहां राजा और देव एक साथ उपस्थित होते हैं।
सामूहिक आस्था की मिसाल: हर घर बना धर्मस्थल, हर दिल बना मेहमाननवाज़
आस्था, एकता और सहभागिता का अनुपम संगम इस दौरान देखने को मिलता है ।धार्मिक आयोजन के दौरान गांव के हर घर ने अपनी जिम्मेदारी निभाई और हर परिवार ने मिलकर उत्सव को सफल बनाने में अहम भूमिका अदा की।गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं और बच्चों तक ने धार्मिक कर्तव्यों में सक्रिय भागीदारी निभाई । मेहमानों के स्वागत से लेकर भोजन, आवास और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक – हर कार्य संगठित और भावनात्मक रूप से जुड़ा रहा ।यह आयोजन केवल धार्मिक रीतियों का निर्वहन नहीं, बल्कि गांव की एकता, परंपरा और आपसी सहयोग का प्रमाण भी रहा ।
एक स्थानीय निवासी के अनुसार:
“यह हमारे लिए सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि पूरे गांव को एक धागे में पिरोने वाला आत्मिक उत्सव है।”

यह मिलन केवल देवी-देवताओं का नहीं, बल्कि जनमानस की आस्था और श्रद्धा का उत्सव होता है। जैसे ही देव रथ बायलिंग पहुंचता है, हर दिशा से बगुलों की तरह लोग उमड़ पड़ते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज, देव परंपरा के गीत, और शंखनाद इस दिव्य मिलन को और भी अलौकिक बना देते हैं।


माता देवी की और से आयोजित धाम में लोग मंदिर प्रांगण में भोजन कर रहे हैं ।






