
देव परंपरा के सबसे मजबूत स्तंभ, करीब 100 वर्षीय जिया लाल नेगी ने पूरा जीवन देव सेवा को समर्पित किया। तिब्बत व्यापार, सिल्क रूट और सीमांत देव संस्कृति के जीवंत इतिहास के साथ एक युग का अंत हो गया।
IBEX NEWS BUREAU,शिमला
छितकुल (किन्नौर)। भारत-चीन सीमा पर बसे देश के अंतिम गांव छितकुल में मंगलवार रात ऐसा मार्मिक दृश्य देखने को मिला जिसने पूरे गांव को शोक में डुबो दिया। गांव के सबसे बुजुर्ग, माता देवी के आजीवन कारदार और देव परंपराओं के जीवंत इतिहास माने जाने वाले जिया लाल नेगी ने देवता कार्यक्रम की विधिवत विदाई के कुछ ही क्षण बाद अंतिम सांस ली। जीवनभर देव सेवा में समर्पित रहे जिया लाल नेगी मानो अपना अंतिम दायित्व निभाने के बाद हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गए।
गांव में पिछले तीन दिनों से धार्मिक उत्सव के चलते दीपावली जैसा उल्लास था। संयोग ऐसा रहा कि इस बार देवता का ‘शुकुद’ भी जिया लाल नेगी के घर में हुआ था।उनके पोते ठाकुर भगत, मोंटू का शुकुद रहा ।घर में संतान होने की ख़ुशी में देवी,देवताओं को बधाई देते हैं जिनसे माता पिता या दादा दादी ने संतान की इच्छा की हो और संतान प्राप्ति के बाद कभी भी जीवन में बधाई समारोह यानी शुकुद किया जाता है ।अपने पोतों के लिए घर में यही आयोजन था ।वर्षों से इस दिन के लिए तैयारियाँ होती हैं कि कोई कमी न रह जाए क्योंकि पूरे परगने के लोग भी आमंत्रित रहते है। समारोह में देव सेवा का अंतिम फर्ज निभाया… फिर हमेशा के लिए आंखें मूंद गए जिया लाल नेगी।
हालांकि उन्होंने स्वयं रक्कछम के देवता शमशेर जी को न्यौता देने की परंपरा निभाई थी। रात को देवता और माता देवी की विधिवत विदाई के बाद करीब 11 बजे उन्होंने सिरदर्द और चक्कर आने की शिकायत की। परिवार के लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले ही उन्होंने गहरी सांस ली और कुछ ही सेकंड में इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
विडंबना यह रही कि जिस घर में कुछ देर पहले धार्मिक आस्था और उत्सव की खुशियां थीं, पल भर में जश्न मातम में बदल गया और पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई।जिया लाल नेगी केवल एक बुजुर्ग नहीं थे, बल्कि छितकुल की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की पहचान थे। वर्षों तक माता देवी के कारदार के रूप में उन्होंने जिस निष्ठा और समर्पण से सेवा की, वैसा सौभाग्य शायद ही किसी और को मिला हो। गांव का कोई भी धार्मिक या सामाजिक आयोजन उनकी सलाह और उपस्थिति के बिना पूरा नहीं माना जाता था।छितकुल ही नहीं, बल्कि पूरे किन्नौर के करदारों में उनकी विशिष्ट पहचान और सम्मान था। उनके निधन से सीमांत क्षेत्र ने देव संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक जीवन का एक अमूल्य संरक्षक खो दिया है।
वे उस पीढ़ी के आखिरी लोगों में शामिल थे जिन्होंने भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक संबंधों का दौर अपनी आंखों से देखा था। स्वयं भी तिब्बत व्यापार से जुड़े रहे जिया लाल नेगी को सिल्क रूट के पुराने रास्तों, दुर्गम दर्रों और हिमनदों के बीच से गुजरने वाले पारंपरिक मार्गों का अद्भुत ज्ञान था। वे बताते थे कि किस तरह ग्लेशियरों की गहरी दरारों को पार कर व्यापारी और श्रद्धालु अपने सफर पूरे करते थे। उन्हें हमेशा इस बात का अफसोस रहता था कि वे ऐतिहासिक रास्ते अब समय की धूल में खो चुके हैं।
माता देवी की यात्रा के साथ वे बीसियों बार पैदल गंगोत्री धाम तक जा चुके थे। सीमांत क्षेत्र में तैनात भारतीय सेना और आईटीबीपी के अधिकारी भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे। उनका सहज स्वभाव, मधुर व्यवहार और सभी के प्रति अपनापन उन्हें पूरे क्षेत्र में विशिष्ट पहचान दिलाता था।
गांव में जब भी कोई मेला या धार्मिक आयोजन होता, सबसे पहले जिया लाल नेगी को सम्मानपूर्वक बुलाया जाता, क्योंकि परंपरा के अनुसार ‘चौनी’—याक के बालों से बनी पवित्र ध्वजा—सबसे पहले उनके हाथों से ही लहराई जाती थी। यह सम्मान उनके व्यक्तित्व और समाज में उनके स्थान का प्रतीक था।
जिया लाल नेगी के निधन के साथ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि छितकुल की सदियों पुरानी लोक परंपराओं, देव संस्कृति, तिब्बत व्यापार और सीमांत जीवन का एक जीवंत अध्याय भी हमेशा के लिए इतिहास बन गया। आज पूरा छितकुल यही कह रहा है—“हमने अपना सबसे बड़ा बुजुर्ग ही नहीं, अपना चलता-फिरता इतिहास खो दिया।”
डॉ. आर.एस. नेगी, प्रोफेसर, पल्मोनरी मेडिसिन विभाग, आईजीएमसी शिमला ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि जिया लाल नेगी बेहद साफ दिल, मिलनसार और हमेशा खुशमिजाज व्यक्तित्व के धनी थे। करीब 100 वर्ष की आयु में भी वे छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के साथ सहजता से घुल-मिल जाते थे।अपना पूरा जीवन देव परंपराओं की सेवा को समर्पित किया और पूरी शिद्दत व निष्ठा के साथ वर्षों तक देव सभा में महत्वपूर्ण सेवाएं दीं।
महासू देवता के पुजारी तुलसी नेगी ने कहा कि हम भी वर्षों से देव सभा से जुड़े रहे हैं। जिया लाल नेगी की मौजूदगी हम सभी के लिए प्रेरणा और उत्साह का स्रोत होती थी। उनसे देव परंपराओं, अनुशासन और सेवा भावना के बारे में बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला। उनका सरल स्वभाव, अनुभव और मार्गदर्शन हमेशा याद रहेगा। उनके निधन से देव समाज ने एक अनुभवी, सम्मानित और समर्पित कारदार को खो दिया है, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।
माता देवी के माथस कृपाल सिंह और पूर्व पुजारी श्रीनंद ने जिया लाल नेगी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जिया लाल नेगी केवल देव परंपरा के कारदार ही नहीं, बल्कि हम सभी के मार्गदर्शक थे। देव संस्कृति, परंपराओं और रीति-रिवाजों का उनका ज्ञान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा था। उनके स्नेह, अनुभव और मार्गदर्शन को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनके निधन से देव समाज और पूरे किन्नौर ने अपूरणीय क्षति झेली है।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राकेश नेगी ने कहा कि जिया लाल नेगी उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसने भारत-तिब्बत व्यापार का दौर न केवल देखा, बल्कि उसका हिस्सा भी रहे । उन्हें प्राचीन सिल्क रूट, सीमांत व्यापारिक मार्गों और पारंपरिक यात्राओं का अद्भुत ज्ञान था। उनके पास वह अनुभव और जानकारी थी, जो आज इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है। उनके निधन से सीमांत क्षेत्र ने अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का एक अमूल्य संरक्षक खो दिया है।


