
महिलाओं ने पेश की इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल; राशन स्टोर, पेयजल लाइनें और सड़कें तबाह, लेकिन सीमा के प्रहरियों को भूखा नहीं सोने दिया ग्रामीणों ने
IBEX NEWS BUREAU,शिमला
भारत-तिब्बत सीमा से सटे किन्नौर के मस्तरंग में शनिवार शाम आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि वह ऐसा क्षण था जिसने कुछ ही सेकंड के अंतर से सैकड़ों जिंदगियों को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया। यदि समय ने साथ न दिया होता तो यह सीमांत क्षेत्र के इतिहास की सबसे भयावह त्रासदियों में दर्ज हो सकता था।
छितकुल में आयोजित होने वाले पारंपरिक ‘शुकुद’ उत्सव के लिए देवता शमशेर के रथ के साथ रक्कछम गांव से निकला सौ से अधिक श्रद्धालुओं का विशाल जत्था हादसे वाले स्थान को कुछ ही पल पहले गुजरा था। वाद्य यंत्रों की गूंज, देव संस्कृति की आस्था और उत्सव का उल्लास अपने चरम पर था। वहीं समीप स्थित 2nd बटालियन ITBP के जवान भी सामान्य ड्यूटी में जुटे थे। किसी को आभास तक नहीं था कि अगले ही क्षण प्रकृति अपना रौद्रतम स्वरूप दिखाने वाली है।





शाम करीब 4:30 बजे अचानक आसमान तेज गर्जना से कांप उठा। बादल फटने की भयावह आवाज के साथ घने देवदारों के बीच बहने वाला गारगे नाला देखते ही देखते उफन पड़ा। विशाल बोल्डरों, चट्टानों और मलबे का सैलाब सीधे 2nd बटालियन ITBP के परिसर में घुस आया। कुछ ही मिनटों में कैंप का बड़ा हिस्सा मलबे के नीचे दब गया। जवानों के बैरकों तक पानी और मलबा पहुंच गया। राशन भंडार नष्ट हो गया, पेयजल पाइपलाइनें बह गईं और कैंप को जोड़ने वाले सड़क मार्ग पूरी तरह खत्म हो गए। मेडिकल शिविर और कैंटीन को छोड़ अधिकांश परिसर तबाही का मंजर बन चुका था।

इसी तबाही के बीच प्रकृति ने एक ऐसी चेतावनी भी दी जिसने नीचे बसे रक्कछम गांव को समय रहते सतर्क कर दिया। मलबे के साथ बहते हुए ITBP कैंप के बड़े ड्रम बासपा नदी में चट्टानों से टकराकर लगातार गूंज रहे थे। नदी में बजती यह असामान्य आवाज ग्रामीणों के लिए किसी सायरन से कम नहीं थी। लोगों ने तुरंत समझ लिया कि ऊपर कोई बड़ा हादसा हुआ है।दुमती या मस्तरंग से ये ड्रम्स बहे हैं और बासपा नदी का रंग भी बेहद पत्थरों मिट्टी वाला है ।सूचना मिलते ही रक्कछम पंचायत की प्रधान सुनीला कुमारी, वार्ड सदस्य उमाभक्ति, फूलवंती सहित करीब 20 /25ग्रामीण बिना किसी इंतजार के सीधे ITBP कैंप की ओर निकल पड़े। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि पूरा परिसर मलबे से पट चुका है। राहत की बात यह थी कि सभी जवान सुरक्षित थे, लेकिन उनके सामने भोजन, पेयजल और आवश्यक सुविधाओं का गंभीर संकट खड़ा हो चुका था।
इसके बाद जो दृश्य सामने आया, उसने सीमांत हिमालय की संवेदनशील संस्कृति और इंसानियत को नई पहचान दी। यहां संपर्क मार्ग का नामोनिशान मिट गया था, दलदल में कैंपस बदला था।प्रधान सुनीला कुमारी ने बताया कि गांव वापस जाकर अभी से अपील की कि संकट की घड़ी में देश के प्रहरियों की रक्षा के लिए सभी घरों की रसोइयों में खाना पकेगा ।समय कम था तो लोगों ने एकजुटता दिखाई और रक्कछम की महिलाएं और पुरुष अपनी पीठ पर राशन, पानी और जरूरी सामान लादकर पैदल कैंप तक पहुंचे। जवानों को सबसे पहले साफ पेयजल उपलब्ध कराया गया, फिर गर्म चाय और कॉफी पहुंचाई गई। सुबह का नाश्ता भी गांव से आया और रविवार दोपहर का भोजन भी रक्कछम के लोगों ने ही उपलब्ध कराया। आज रविवार रात के भोजन की जिम्मेदारी देश के पहले गांव छितकुल ने संभाल ली है ।







सरहद के अंतिम गांवों के इन ग्रामीणों ने यह साबित कर दिया कि सीमा की सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि समाज और सैनिकों के बीच विश्वास, अपनत्व और साझी जिम्मेदारी से भी मजबूत होती है। जब पूरा कैंप मलबे में दबा था, तब गांव की महिलाएं अपने कंधों पर राहत लेकर देश के प्रहरियों तक पहुंच रही थीं। यह दृश्य किसी सरकारी अभियान का नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की जीवंत संवेदना का था।
शारदा नेगी ने बताया कि हम महिलाएं ख़ुश है कि हमे भी देश सेवा से जुड़ने का मौका मिला और हमारा ये कर्तव्य भी बनता है कि वे अपनी जान की परवाह किए बिना देश की रक्षा करते है हम भी मुसीबत में उनके साथ खड़े है ।
उमाभक्ति बताती हैं कि देश सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं ।ये हमारा फ़र्ज़ है कि मुसीबत में हम भी देश के काम आए ।देश सेवा के लिए कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता बस भावनाएं बड़ी होती हैं ।
इस भीषण आपदा के बीच सबसे बड़ी राहत यह रही कि ITBP के किसी भी जवान को कोई शारीरिक क्षति नहीं पहुंची और जनहानि की कोई सूचना नहीं है। हालांकि कैंप, राशन भंडार, पेयजल व्यवस्था और संपर्क मार्गों को भारी नुकसान पहुंचा है, लेकिन संकट की इस घड़ी में रक्कछम और छितकुल के लोगों ने जिस समर्पण, साहस और सेवा-भाव का परिचय दिया, उसने यह संदेश दिया कि सीमाओं की रक्षा केवल सैनिक ही नहीं करते, बल्कि सीमांत गांवों का हर परिवार भी उस जिम्मेदारी का बराबर भागीदार होता है।

तीन दिनों तक चलेगा देव मिलन और ‘शुकुद’ उत्सव
आपदा के बावजूद क्षेत्र की पारंपरिक धार्मिक परंपराएं निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जारी रहेंगी। रक्कछम के देवता अगले तीन दिनों तक छितकुल में विराजमान रहेंगे। तय कार्यक्रम के अनुसार आज और कल ‘शुकुद’ उत्सव आयोजित होगा। इसके बाद माता देवी प्रांगण में देव मिलन का आयोजन किया जाएगा। समापन पर छितकुल माता देवी रक्कछम पहुंचेंगी, जहां माता देवी के नाम पर विशेष ‘शुकुद’ आयोजित किया जाएगा।




