
गैच़ा पर्व के अंतिम दिन रजत प्रतिमा और ‘यूम’ ग्रंथों के साथ निकली भव्य धार्मिक यात्रा; मंत्रोच्चार और पारंपरिक किन्नौरी वेशभूषा में डूबी नाको घाटी
IBEX NEWS BUREAU,शिमला/किन्नौर
सीमावर्ती क्षेत्र नाको में तीन दिनों से चल रहे ऐतिहासिक ‘गैच़ा पर्व’ के आज आखिरी दिन आस्था और श्रद्धा का ऐसा सैलाब उमड़ा, जिसने ऊपरी किन्नौर के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। आज तिब्बती पंचांग के अनुसार सबसे पवित्र तिथि ‘छेपा चय्ङा (15)’ है, जिसके चलते पूरा नाको देवभूमि के पारंपरिक रंग और बौद्ध मंत्रों की गूंज से सराबोर हो उठा है। आज का दिन इस मायने में सबसे खास है क्योंकि आज महा-परिक्रमा यानी ‘भूमकोर’ का महा-अनुष्ठान संपन्न हो रहा है।
दोपहर होते ही नाको लाखंग गोंपा के कपाट खुले और चारों तरफ शंख, ढोल और लामाओं के मंत्रोच्चार की ध्वनि गूंज उठी। पावन परंपरा को निभाते हुए ग्रामीणों और विशेषकर महिलाओं ने पारंपरिक किन्नौरी वेशभूषा और डोहू पहनकर भगवान दोर्जे छंग की प्राचीन रजत प्रतिमा तथा पवित्र बौद्ध धर्मग्रंथों (यूम) को अपने कंधों पर उठा लिया। यह भव्य और विहंगम दृश्य देखते ही बनता था, जब सैकड़ों श्रद्धालुओं की कतार इस दुर्गम पहाड़ी मार्ग पर धर्म की ध्वजा लिए आगे बढ़ी।



यह पावन धार्मिक यात्रा नाको लाखंग गोंपा से अत्यंत अनुशासित और भक्तिमय माहौल में शुरू हुई। मार्ग में मॉलिंग गोंपा से होते हुए जैसे ही यह यात्रा यांगोन गोंपा पहुँची, वहाँ का पूरा वातावरण आनंदमय और भक्तिमय बन गया। यांगोन गोंपा में विशेष विश्राम और पूजा-अर्चना के बाद भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जहाँ क्षेत्र की समृद्ध लोक-संस्कृति की अनूठी झलक देखने को मिल रही है।

‘भूमकोर’ का महात्म्य: एक परिक्रमा और लाखों पुण्य
गाँव के बुजुर्गों और लामाओं के अनुसार, आज के इस अंतिम दिन का महत्व शब्दों से परे है। ‘भूमकोर’ शब्द का अर्थ ही यही है— ‘भूम’ यानी लाख और ‘कोर’ यानी परिक्रमा। मान्यता है कि आज की इस पावन अवधि में किसी पवित्र स्थल या इन धर्मग्रंथों के साथ की गई एक परिक्रमा, आम दिनों की लाखों परिक्रमाओं के समान पुण्यफल प्रदान करती है। यही कारण है कि आज बच्चे, बूढ़े और जवान सभी इस महा-यात्रा का हिस्सा बनने के लिए मीलों पैदल चलकर पहुँचे हैं।

संसाधनों की कमी पर भारी अटूट आस्था
बुजुर्गों ने भावुक होते हुए बताया कि पहले के समय में आज के दौर जैसे साधन और सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन धर्म के प्रति निष्ठा इतनी गहरी थी कि लोग मार्ग में रुक-रुककर इन भारी यूम ग्रंथों का पाठ करते थे। आज आधुनिकता के दौर में भी नाको की युवा पीढ़ी ने अपनी इस सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक एकता और श्रद्धा की परंपरा को पूरी शिद्दत से जिंदा रखा है।
शाम को इस पवित्र यात्रा के पुनः नाको मठ में संपन्न होने के साथ ही इस वर्ष के पावन गैच़ा पर्व का समापन हो जाएगा। यह पर्व एक बार फिर संदेश दे गया कि देवभूमि की लोक-परंपराएं और आध्यात्मिकता आज भी अचल और अमर हैं।




