
हौसलों को शाबाशी का इंतज़ार, कब जागेगा प्रशासन?”इतिहास, साहस और अनदेखी: लमखागा दर्रे की कहानी,जानिये इन छितकुलवालों की जुबानी
IBEX NEWS BUREAU,शिमला
जब इरादे चट्टानी हो और मन में अपनी कुलदेवी के प्रति अटूट श्रद्धा हो, तो दुनिया के सबसे खतरनाक दर्रे भी सुगम मार्ग लगने लगते हैं। हिमाचल प्रदेश के ट्राइबल जिले किन्नौर के ‘वाइब्रेंट विलेज’ छितकुल से नौ सदस्यीय दल ने वह कर दिखाया है, जिसे पेशेवर पर्वतारोही भी बिना तकनीकी उपकरणों के करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। 17,320 फीट की ऊंचाई पर स्थित ‘छोटाखागा पास’ स्थानीय बोली में “छोट्टया पास “की बर्फीली ढलानों को पार कर यह दल आज पवित्र गंगोत्री धाम पहुंच गया है।इस दल में शामिल 36 वर्षीय सुधीर नेगी, जो बायोटेक्नोलॉजी में एमएससी हैं, आस्था की इस शक्ति को वैज्ञानिक नजरिए से नहीं बल्कि अनुभव से देखते हैं। नेगी बताते हैं, “पर्यटन कारोबार से जुड़े होने के कारण मैं पहले भी लमखागा पास आ चुका हूँ, लेकिन तब मन में डर था। छितकुल से गंगोत्री जाने वाले पारंपरिक हिमालयी मार्ग में छोटाखागा पास (Chhotakhaga Pass / Chhota Khaga) को लामखागा पास का एक वैकल्पिक रास्ता माना जाता है। “छोटाखागा” का शाब्दिक अर्थ है — छोटा या छोटा रास्ता वाला दर्रा। यह दर्रा लामखागा पास के दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित है और कुल ट्रेक दूरी को लगभग 10 किलोमीटर तक कम कर देता है।इस बार माता ‘माथी’ के साथ की ऐसी ‘आस्था’ थी कि डर का नामोनिशान नहीं था। बस एक विश्वास था कि हमारे वश में कुछ नहीं, जो कर रही हैं माता देवी ही कर रही हैं।उनके लिए यह यात्रा दोहरी खुशी लेकर आई। यात्रा के दौरान ही वे भारी मतों से ‘उप-प्रधान’ चुन लिए गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि सुधीर ने सोशल मीडिया पर अपील की थी कि वे माता की सेवा में जा रहे हैं, इसलिए खुद को भी वोट नहीं कर पाएंगे।ऐसी अपील पर गांव वालों ने उनकी आस्था का सम्मान किया और उन्हें ऐतिहासिक जीत दिलाई।छितकुल की देवी ‘माथी’ को पूरे क्षेत्र की रक्षिका, किन्नौर की देवियों में सबसे शक्तिशाली देवी माना जाता है और पर्यावरण की संरक्षक माना जाता है। मान्यता है कि देवी वृंदावन से यहाँ आई थीं। हर साल माता गंगोत्री धाम जाती हैं और गंगा माता की गोद में बैठती हैं। कहते हैं कि छितकुल माता देवी माँ गंगा की पुत्री है ।इस यात्रा के लिए वे खुद अपने दल का चयन करती हैं। इस बार नौ सदस्यों की टीम ने इस कठिन मार्ग को फतह किया है ।दल में सुधीर नेगी के साथ महासू देवता के माली 56 वर्षीय तुलसी राम नेगी,56वर्षीय अशोक भंडारी,52 वर्षीय जवाहर लाल नेगी,49 साल के हीरा सिंह नेगी ,53वर्ष के यशवंत सिंह नेगी ,43साल के भागरत्न नेगी ,प्रवीण नेगी 35 साल ,टिंकल माथस 34 वर्षीय शामिल है ।अशोक भंडारी 15 मर्तबा तुलसी राम नेगी 6,यशवंत नेगी और भागरत्न चार बार और जब से टिंकल माथस बने है वे भी यात्रा में कई बार आ चुके हैं ।अन्य शेष फर्स्ट टाइमर है ।माता देवी के माथस टिंकल ने ही 18 साल पहले इस्तेमाल में लाए गए छोटाखागा पास ट्रेक को फिर से सुचारू करने के लिए कहा ।दल में अशोक नेगी को रास्ता धुंधला याद था और बीते साल के बाद इस बार भी दल इस छोट्या पास ग्लेशियर वाले रास्ते से आगे बढ़े हैं ।






हैरानी की बात ये कि राज्य सरकारें और जिला प्रशासन धेले भर की किसी भी तरह की सहायता इस जोखिमभरी पवित्र यात्रा धाम में नहीं करते है।इस टीम में मुख्य पुजारी /माथस को एक्रोफोबिया’ (Acrophobia) है ,मगर आस्था इस पर भारी पड़ी है ।सुधीर नेगी ने अपने अनुभव में जिक्र किया कि ‘आस्था’ के कारण इस डर पर जीत पाई।
दीगर हो कि इस ट्रेक का मार्ग बेहद दुर्गम है। ट्रेक के दौरान किसी भी प्रकार की बचाव सहायता मिलना अत्यंत कठिन है। एक बार ट्रेकिंग शुरू करने के बाद नेटवर्क से पूरी तरह कट जाता है ।इतनी ऊंचाई पर चलने से तीव्र श्वसन तंत्र की समस्या (एएमएस) हो सकती है। पतली हवा के कारण चलना मुश्किल हो जाता है और चलने की गति धीमी हो जाती है। शरीर की बुनियादी गतिविधियां भी थका देने वाली हो जाती हैं।इस ट्रेक पर मौसम बेहद खराब हो सकता है। यह एक लंबा ट्रेक है और अधिक ऊंचाई पर मौसम का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है। ट्रेक के दौरान बर्फ़ीले तूफ़ान का सामना करना पड़ सकता है। गर्मियों में भी रात के समय तापमान अक्सर शून्य से नीचे चला जाता है।



The majestic, hazy mountains stretching into the distance.

मौसम में अचानक बदलाव से जोखिम बढ़ सकता है।यह ट्रेकिंग केवल अनुभवी पर्वतारोहियों के लिए है।
बेहद चुनौतीपूर्ण ट्रेक है छोटाखागा पास (Chhota Khaga Pass) की ऊंचाई लगभग 17,320 फीट (5,280 मीटर) है। यह ऊंचाई इसे हिमालय के सबसे कठिन और ‘हाई-एल्टीट्यूड’ दर्रों की श्रेणी में रखती है। हालांकि इसकी ऊंचाई मुख्य लामखागा पास (लगभग 17,336 फीट) से थोड़ी सी कमहै ।छोटाखागा मार्ग (17,320 फीट) दूरी में भले ही छोटा हो, लेकिन यह लमखागा पास से अधिक खड़ा और जोखिमपूर्ण है। यहाँ की सीधी बर्फीली ढलानें और ग्लेशियर अनुभवी ट्रेकर्स की भी परीक्षा लेते हैं। 1933 में प्रसिद्ध पर्वतारोही मार्को पालिस ने इस दर्रे को पार किया था। यह मार्ग सदियों से किन्नौर (बास्पा घाटी) और उत्तराखंड (हर्षिल/क्यारकोटी घाटी) के बीच एक सांस्कृतिक सेतु रहा है, जो गंगा और सिंधु नदी बेसिनों को विभाजित करता है।छितकुल ग्रामवासियों का दावा है कि सदियों से ये ट्रेक आस्था से जुड़ा है,गांव में माता देवी का मंदिर 400से अधिक पुराना है और इस यात्रा पर पूर्वज जाते रहें है तो हमारे बुजुर्गों की झोली में ये सम्मान आना चाहिए कि सबसे पहले इस गगनचुम्भी ग्लेशियर्स को हमने मापा है,किसी अंग्रेज ने नहीं ।तर्क ये कि पहले गांव के पूर्वजों की अस्थियाँ गंगोत्री में ही बहाई जाती थी ,हरिद्वार में नहीं । क़रीब 80 साल की आयु की बरम देवी,100 से अधिक उम्र के जियालाल नेगी बता रहें हैं कि यात्रा आज भी पुराने समय की भाँति हो रही है ।बरम देवी का कहना है कि जब में 12साल की थी तो माँ की अस्थियाँ इस पवित्र यात्रा के दौरान गंगोत्री ले गई थी ।




हालांकि आज भी ये दर्रा ट्रेक आज भी हमारे देश के कम चर्चित ट्रेकों में से एक है।बिना किसी चिकित्सीय जाँच,टेक्निकल मदद,विशेष हाईटेक कपड़ों और टेंट ,ऑक्सीजन सिलेंडर के दल आगे बढ़ता है ।यहाँ तक कि इस दौरान न कोई पॉटर की व्यवस्था होती। सदियों से चली आ रही इस पारंपरिक यात्रा के दौरान सुबह और शाम का खाना ख़ुद बनाना पड़ता है ।इस दौरान पैक्ड फ़ूड मैगी या सूप आदि जैसा बाजारू खाना अलाउड नहीं होता। तड़के सुबह से देर शाम की यात्रा कितनी ही थकाऊ क्यों न हो विधि विधान से पूजा अनिवार्य रूप से दर्रों पर भी मोटी बर्फ की चादर पर होती हैं ।

ये क्रम गंगोत्री धाम तक नहीं टूटता और जब देवी माता गंगा मैया की गोद में विराजमान होती हैं तब पूजा नहीं होती ।गंगोत्री पूजा में ही उनकी पूजा भी शामिल होती है । कहते है कि वे गंगा माता की सुपुत्री है और वृंदावन से इन्हीं पहाड़ियों को लांघते हुए छितकुल पहुंची । उनके साथ उनका भाई नाग देवता भी थे जो छितकुल गाँव के बाहर गुफ़ा में रहते हैं जब माता देवी स्वर्ग प्रवास पर जाती हैं तब वे गाँव की कमान सँभालते हैं ।इस समय वे गाँव के क़िले में विराजमान रहते है।इस यात्रा पर अकेली जाती है ।माता देवी की यात्रा कब पूरी होगी,कब वापस होगी वे सब उनके द्वारा ही तय होता है । इस यात्रा के दौरान अब तक भी भी कोई अनहोनी घटना नहीं घटी है ।लमखागा दर्रे का इतिहास गवाह है कि प्रकृति की चुनौती और प्रशासनिक बेरुखी के बीच का फासला बहुत कम है। 2021 की त्रासदी के घाव आज भी ताज़ा हैं, लेकिन गांव वालों की जा रही सुरक्षित यात्रा ने यह साबित किया है कि सही हौसले और स्थानीय ज्ञान के साथ हिमालय की इन दुर्गम ऊंचाइयों को जीता जा सकता है। विडंबना यह है कि जहाँ एक ओर सरकार ‘इंटरनेशनल बॉर्डर टूरिज्म’ के बड़े सपने देख रही है, वहीं ज़मीनी स्तर पर इन ऐतिहासिक रास्तों को पुनर्जीवित करने वाले जाँबाज़ों और छितकुलवासियों को प्रोत्साहन के दो शब्द तक नसीब नहीं होते। पर्यटन को केवल तकनीकी सहयोग से नहीं, बल्कि इन साहसी परंपराओं को सम्मान देकर ही ‘नए पंख’ लगाए जा सकते हैं।अब समय आ गया है कि प्रशासन ‘प्रतिबंध’ की मानसिकता से बाहर निकलकर इन ऐतिहासिक मार्गों को पर्यटन के मानचित्र पर मजबूती से स्थापित करे। बॉर्डर टूरिज्म को भुनाने के लिए केवल नीतियां नहीं, बल्कि उन जाँबाज़ों को शाबाशी और सहयोग देने की ज़रूरत है जो अपनी जान हथेली पर रखकर इन सीमाओं की सुरक्षा और पहचान को ज़िंदा रखते हैं।



